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Tuesday, July 30, 2019

'अपनी समझ' के तहत "पुस्तक समीक्षा" - जिंदगी 50 -50 (उपन्यास)

उपन्यास - जिंदगी 50 -50 
लेखक - भगवंत अनमोल  

अनमोल जी का "जिंदगी 50-50" उपन्यास पढ़ने का सुअवसर मिला। मेरा इस उपन्यास तक पहुंचना निश्चित रूप से एक संयोग ही है। चूंकि मैं फेसबुक पर चल रहे 'हिन्दी लेखक संघ' समूह का सदस्य हूँ और इस समूह के एक साहित्यकार सदस्य डॉ फैयाज अहमद की फेसबुक पोस्ट से पता चला कि भगवंत अनमोल जी ने "जिंदगी 50-50" नामक उपन्यास लिखा है। लेखक के बारे में जब पता चला कि आप कानपुर से हैं तो यहाँ क्षेत्रवाद ने थोड़ा काम किया और मैं इस कारण भी लेखक को पढ़ने के लिए उत्सुक हो गया। इसके बाद जब डॉ फैयाज जी का एक साक्षात्कार इस पुस्तक के बारे में पढ़ा तो विषय के बारे में थोड़ी जिज्ञासा और बढ़ी। प्रेम कथाएं तो बहुत उपलब्ध हैं पर किन्नरों का विषय हमारे समाज में विभिन्न कारणों से चर्चा का विषय तो है और लोग इनके बारे में शायद जानते भी हैं लेकिन यह विषय कभी खुले और स्वस्थ रूप में बहसों का हिस्सा नहीं बना। जब भी इसकी चर्चा हुई, छुप छुपाकर या हम उम्र के लोगों ने जो जहाँ जैसी जानकारी मिली, बात की। इसका परिणाम ये हुआ कि जिसे जो जानकारी थी, चाहे वह सही भी थी, उसे कभी प्रामाणिक जानकारी नहीं समझा गया। अच्छा, इस विषय को नजरअंदाज या नकारा भी नहीं जा सकता क्योंकि किन्नर हमें जाने अनजाने दिख ही जाते हैं। कभी किसी के घर बच्चा पैदा हुआ, किन्नर आ गए। शादी विवाह हुआ, किन्नर आ गए। और नहीं तो कहीं चौराहे की लाल बत्ती पर मिल गए, कभी आउटर पर ट्रेन रुकी, किन्नर आ गए।

अनमोल जी ने इस उपन्यास में दो कथाओं को समानांतर रूप से लिखा है, ऐसे दो भी क्यों, अगर तीन भी कहें तो गलत नहीं होगा। एक तो अनमोल (उपन्यास का नायक) के पिता जी और हर्षा/ हर्षिता (अनमोल का भाई - जिसको केंद्र में रखकर यह उपन्यास लिखा गया) की कहानी, अनमोल की अनाया (अनमोल की प्रेमिका और नायिका) के साथ प्रेम कहानी और अनमोल की सूर्या (अनमोल का बेटा) के साथ की कहानी।

लगभग आधा उपन्यास पढ़ने तक ऐसा लगा कि पहली दो कहानियां ज्यादा समानांतर नहीं हैं और एक के बाद लिखी हैं अतः ऐसा लगा कि पहले अनमोल और उसके पिता जी की कहानी छाँट छाँट कर पढ़ ली जाए और बाद में इसी तरह अनमोल और अनाया की कहानी लेकिन जब तक यह पाठक निर्णय लेता है, कड़ियाँ जुड़ने लगती हैं और फिर अलग अलग वाला विचार छोड़ना पड़ता है।

उपन्यास को अनमोल जी ने जिस शैली और कुशलता से लिखा है वह पाठकों को कहानी के साथ ज्यादा जोड़े रखता है। पाठकों को ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे लेखक उसके सामने बैठ कर कहानी सुना रहा है। कहानी जैसे जैसे बढ़ती है पाठक को किसी चलचित्र की भांति उसमें प्रवेश कर देती है लेकिन अधिकतर स्थानों पर लेखक ने नायक की तुलना शाहरुख खान की फिल्मों में नायक से की है। जैसे ही यह तुलना पाठक पढ़ता है, वह तुरंत चलचित्र वाले माहौल से बाहर आ जाता है और पाठक को इसके काल्पनिक होने का एहसास होने लगता है लेकिन अगले ही पल गाड़ी फिर प्रवाह पकड़ लेती है। इसी प्रकार कुछ स्थानों पर चेतु भैया (चेतन भगत) की पुस्तकों और उनमें मौजूद किरदारों के भी जिक्र है जो कुछ पाठकों के लिये या तो अनभिज्ञ होने के कारण या फिर वह उनके पसंदीदा लेखक न होने के कारण अरुचिजनक सबब बनता होगा। इस उपन्यास में शाहरुख खान की फिल्मों और चेतन भगत की किताबों का जिक्र जब देखा तो मेरा ध्यान विदेशी लेखकों की किताबों की तरफ चला गया। अक्सर विदेशी लेखक अपनी किताबों में या तो अपनी पुरानी किताबों या उनके मित्रों की किताबों का संदर्भ देते मिल जाएंगे। असल में यह एक तरीका परोक्ष रूप से संदर्भित किताबों की मार्केटिंग के रूप में भी किया जाता है, जो कि एक तरह से ठीक भी है।

इस उपन्यास में लेखक ने अंग्रेजी के शब्दों का और सोशल मीडिया का भरपूर प्रयोग किया है जो कि आजकल आम भाषा और जीवनचर्या का हिस्सा हैं। इससे जरूर ही आजकल के पाठक पसंद करेंगे। इसी तरह पुस्तक में गांव की बोली का बहुतायत में इस्तेमाल हुआ है जो कि हिन्दी भाषी क्षेत्र और उम्रदराज लोगों में तो रुचि बनाये रखती ही है साथ ही नौजवान पाठक जिनका गांव और वहां की बोली से सरोकार खत्म या न के बराबर है, उन्हें भी उस परिवेश से परिचय कराती है। कहीं-कहीं उपन्यास में बहुत जगह पाठकों को कई चीजें विस्तार से समझाई गई हैं, जो कि शुरुआत में (जैसे मूंछों वाले लोग, वगैरा... बताए गए हैं) तो पाठक को उत्सुकता पैदा करते हैं और पढ़ने को प्रेरित करते हैं लेकिन बाद में जब इसी तरह की पुनरावृत्ति थोड़ी अजीब भी लगती है।

उपन्यास में अनमोल जी ने एक आम उच्च मध्यम वर्गीय परिवार की मनोदशा का बखूबी चित्रण किया है जिसमें यह बताया है कि ग्रमीण क्षेत्र में उसका हर कृत्य किस प्रकार से समाज से जुड़ा हुआ है। उसकी पसंद, नापसंद अपने से ज्यादा 'समाज क्या कहेगा?' इस बात पर निर्भर करती है फिर चाहे उसे अपनी या अपने परिवार की खुशियों की बलि ही क्यों न देनी पड़े। अनमोल के पिता ने सिर्फ समाज की वजह से ही न सिर्फ अपने छोटे बेटे को मारने की कोशिश की बल्कि उसकी पूरी जिंदगी उसे यातनाएं देकर उसकी जिंदगी को भी नरक बनाने का काम किया। इस समाज की वजह से वह खुद भी हीन भावना की जिंदगी जीते रहे।

लेखक ने उपन्यास को कम पात्र देकर भी भरपूर व्यक्तित्व दिए हैं। इसे एक खूबी ही कहा जायेगा क्योंकि सीमित पात्रों की वजह से पाठक सभी किरदारों से परिचित और जुड़ा हुआ महसूस करता है। उपन्यास के अंत में लेखक ने अपनी प्रतिभा का परिचय देते हुए खूबसूरत मोड़ दिया है जिसे शायद ही कोई पाठक भांप पाए। यह पाठकों को तबतक पता नहीं चलता है जब तक अनमोल लगभग 28 सालों के बाद अनाया के घर पहुंच नहीं जाता है। अनाया के घर पहुँचने पर जो खुलासे हुए, उससे लेखक ने जहाँ अनाया के चरित्र को नये आयाम दिए वहीं प्यार की अभिव्यक्ति को भी बहुत ऊंचे स्तर पर पहुंचा दिया। लेखक की इसके लिए जितनी प्रसंशा की जाए कम है। इस चित्रण में उपन्यास में जहाँ कुछ देर पहले तक पाठक अनभिज्ञ रहता है वहीं जब अनमोल उसके घर से बाहर आता है और उसे अपनी अनाया के साथ वाली फोटो की याद आती है, प्रबुद्ध पाठक सब कुछ जान जाता है और इसके बाद जो भी वर्णित हुआ है, पढ़कर अपनी विद्वता पर इतराता भी है। इसी वक्त जब अनमोल अनाया से फिर कभी न मिलने का वादा लेकर उसके घर से बाहर निकलता है और रास्ते में उसकी अनाया के बेटे से नजरें मिलती हैं उस  समय पाठक यह सोचता है की जब उसकी फोटो अनाया के साथ उसके घर मे लगी हुई है तो उसके बेटे ने नजरें मिलने के बाबजूद अनमोल को पहिचाना क्यों नहीं? फिर अगले ही पल पाठक अनमोल को इस बात का फायदा देता है कि वह फोटो तो लगभग 28 साल पुरानी है और इस कारण सम्भव है कि क्षणिक मुलाकात में किसी को न पहिचाना जा सके। इसके बाद का जो प्रसंग कि क्यों अनाया के बेटे ने संभावित लाइसेंस को ठुकराया दिया, उसके लिए भी लेखक को बधाई कि उसने अनाया के द्वारा उसके बेटे में अच्छे संस्कार डाले।

भगवंत अनमोल जी को उनके इस उपन्यास के लिए बहुत बधाई और शुभकामनायें। 

रजनीश दीक्षित


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